पर्यावरण के प्रकार -Type of environment

विशेषज्ञों ने पर्यावरण के कई प्रकार बतायें है। कर्ट लेविन ने जीवन विस्तार के संदर्भ में पर्यावरम को तीन प्रकार का बताया है जो व्यक्तित्व विकास में सहायक होता है, जबकि प्रो. एस. एस. कायस्थ के अनुसार पर्यावरण प्रकार का होता है

  1. क्रियात्मक
  2. कार्यात्मक
  3. व्यवहारात्मक
  4. भौगोलिक

बाह्रा पर्यावरण प्रमुख रूप से तीन रूपों में विद्दमान है-

  • भौतिक पर्यावरण
  • जैविक पर्यावरण
  • मनो-सामाजिक पर्यावरण

 

भौतिक पर्यावरण –

पर्यावरण का प्रमुख भाग भौतिक पर्यावरण से मिलकर बनता है, जिसके अन्तर्गत वायु, जल, खाद्द प्रदार्थ, भूमि, ध्वनि, ऊष्मा, प्रकाश, नदी, पर्वत, खनिज पदार्थ, विकिरण एवं अन्य पदार्थ सम्मिलित हैं जिनसे मनुष्य का निरन्तर सम्पर्क रहता है। हमेशा इन घटकों के सम्पर्क में रहने के कारण ये मानव स्वार्थ्य पर सीधा प्रभाव डालते हैं।

  • शाक्तियाॅं – भौतिक पर्यावरण की शक्तियों को दो भागों में विभक्त किया जा सकता है।

(A) बाहा शाक्तियाॅं – इसके अन्तर्गत पर्यावरण के अंग जैसे ऋतु अपक्षय, अपरदन, (जल, पवन, हिमानी, समुद्री लहरे), सूर्य ताप, ग्रहों की आकर्षण शाक्ति, पृथ्वी का परिक्रमण एवं घूर्णन तथा जीवन शाक्तियाॅं; सम्मिलित हैं।

  •  (B) आन्तरिक शाक्तियाॅं – इसके अन्तर्गत पर्वत निर्माणकारी शाक्तियाॅं, भूकम्प, ज्वालामुखी, विस्फोटक शाक्तियाॅं आती है जिसके कारण अनेक प्रकार की प्रक्रियाएं जन्म लेती है, जो पर्यावरण तत्वों का निर्माण करती है।

तत्व – प्राकृतिक प्रक्रियाओं के कारण अनेक तत्व उत्पन्न हो जाते है; जैसे –

(a) भावाचक तत्व -प्रदेश की ज्यामितीय स्थिति, प्राकृतिक स्थिति, आकार आदि

(b) भौतिक तत्व – भू- आकृति, मौसम एवं जलवायु, चट्टानें, मिटिट्याॅं, महासागर, धरातलीय, एवं भूमिगत जल आदि।

(c) जैविक तत्व –पशु जगत, वनस्पति, सूक्ष्म जीवाणु आदि।

प्रक्रियाऐं – सूर्य का ताप,सौर्यिक विकिरण, अपक्षय एवं अपरदन, संवाहन, निक्षेपण, पर्वत निर्माण, भ्रंस घाटियों का निर्माण, ताप संचालन, वायु संचार, भूकम्प, ज्वालामुखी क्रियाएं, समुद्री धारा, लहरे आदि अनेक पर्यावरणीय तत्वों का निर्माण करती है।

जीविक पर्यावरण –

सम्पूर्ण भूमण्डल में जैविक पर्यावरण बहुत बड़ा अवशय है, जो कि मानवों के इर्द- गिर्द रहता है। यहाॅं तक कि मानव के लिए दूसरा मानव भी पर्यावरण का एक भाग है। जीव जन्तु एवं वनस्पति इस घटक के के प्रमुख सहयोगी है। सामान्यतया मनुष्य इन जैविक अवयवो के साथ ।जैविक पर्यावरण का समुचित ज्ञान रोगों के निदान में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। जैविक पर्यावरण को दो भागों में विभक्त किया जाता है – (i) पौधों का वातावरण (ii) जीवों एवं जानवरों का वातावरण। सभी जीव एक सामाजिक समूह में कार्य करते है।

मनो-सामाजिक पर्यावरण

मानव के सामाजिक सम्बन्धों से प्रकट होता है। इसके अन्तर्गत हम सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृति, राजनैतिक एवं अध्यात्मिक क्षेत्रों में मानव के व्यक्तित्व के विकास का अध्ययन करते है। मानव एक सामाजिक प्राणी है। उसे परिवार में माता-पिता एवं भाईृ – बहन आदि से सम्बन्ध बनायें रखना पड़ता है तथा समाज के अन्य वर्ग पास-पडोसी, समुदाय, प्रदेश एवं राष्ट से भी सम्बन्ध बनाएं रखना पड़ता है।

मनुष्य सामाजिक एवं सांस्कृतिक पर्यावरण का उत्पाद है, जिसके द्वारा मानव आकार तैयार होता है। रहन-सहन, खान-पान पहनावा-ओढ़ना, बोल-चाल या भाषा-शैली तथा सामाजिक मान्यताॅं, मानव व्यक्तित्व से प्रत्यक्ष सम्बन्ध रहता है। नैतिक, सांस्कृतिक तथा भावात्मक शक्तियाॅं व्यक्ति के व्यवहार तथा जीवन को अधिक प्रभावित करती है।

यह पर्यावरण दो प्रकार का होता है – मुक्त समाज तथा नियन्त्रित समाज। मुक्त समाज का वातावरण व्यक्तित्व के विकास की दृष्टि से उत्तम माना जाता है जब कि नियन्त्रित वातावरण अनुपयोगी होता है।

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